एक गिलहरी प्यारी प्यारी
भाग भाग के आती
अपने मुंह में दबा छुपा के
कितना कुछ वो लाती
झबरी पूंछ, देह पर धारी
चौकन्नी सी फिरती
उछल कूद करती वो हरदम
हंसी ख़ुशी से रहती
पकड़ हाथ में दाना चुग्गा
बैठ प्यार से खाती
हम जो उसको पास बुलाएँ
कितना वो शरमाती
घास फूस, धागों को चुनकर
अपना घर वो बनाती
तिनके, सूखे पत्ते लाकर
घर को खूब सजाती
प्यारी प्यारी एक गिलहरी
कितना कुछ है सिखाती
करती रहती काम हमेशा
भाग भाग के आती
अपने मुंह में दबा छुपा के
कितना कुछ वो लाती
झबरी पूंछ, देह पर धारी
चौकन्नी सी फिरती
उछल कूद करती वो हरदम
हंसी ख़ुशी से रहती
पकड़ हाथ में दाना चुग्गा
बैठ प्यार से खाती
हम जो उसको पास बुलाएँ
कितना वो शरमाती
घास फूस, धागों को चुनकर
अपना घर वो बनाती
तिनके, सूखे पत्ते लाकर
घर को खूब सजाती
प्यारी प्यारी एक गिलहरी
कितना कुछ है सिखाती
करती रहती काम हमेशा





